उत्तराखंड की लोकसंस्कृति इतनी वैभवशाली है की हर कोई इसका मुरीद हो जाता है, इसी कड़ी में एक विधा है लोक जागरी, कल 17 सितम्बर को डांडी कांठीं क्लब द्वारा उत्तराखंड में पहली बार ‘’’जागर संरक्षण दिवस’’ मनाया जाएगा, जो आने वाले सालों में हर बरस मनाया जाएगा, उत्तराखंड में जागर विधा को जाने वाले बहुत कम लोग मौजूद है, और जो है भी लोग उनके बारे में बहुत कम जानते हैं,
1946 में देश में आजादी की सुबह की खुशबू फिजाओं में तैर रही थी, देशवासी बड़ी बेसब्री से आजादी का इन्तजार कर रहे थे, इसी अवधि में सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ विकासखंड के टंगणी मल्ला गांव में असुज्या देवी और असुज्या लाल के घर बड़े बेटे के रूप में गेणु लाल का जन्म हुआ, इनका परिवार कई पीढ़ियों से जागर विधा की पहचान रहा है, पूरे पैन्खंडा से लेकर दशोली, नागपुर मल्ला, बधाण, सहित कई परगने में इस परिवार के जागरों की धूम हुआ करती थी, या यों कहिये की अलकनंदा से लेकर बिरही, नन्दाकिनी, और पिंडर नदी के भूभाग में बसे गांवो में अगर कहीं भी लोकजागर की बात सामने आती थी तो सबसे पहले न्योता इस परिवार को दिया जाता था,
पूर्वजों से विरासत में मिली जागर विधा को गेणु लाल ने महज ११ बरस की आयु में आत्मसात कर लिया था, ११ साल की आयु में उन्हें समस्त जागर कंठस्त हो गए थे, इन्होने जागरों को न कभी पढ़ा और न ही इसकी कोई ट्रेनिग ली बल्कि लोकसंस्कृति की अनोखी विधा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानान्तरण करने की प्रक्रिया से ही आत्मसात किया, और आज ७० साल की आयु में भी वे जागर विधा के चलते फिरते किसी संस्थान से कम नहीं है, आज भी नीति से लेकर माणा और डिम्मर से लेकर मंडल तक जहां भी जागर गाया जाता है तो गेणु लाल को सबसे पहले निमंत्र्ण भेजा जाता है, और हो भी क्यों न, क्योंकि उनकी आवाज में इतनी मिठास और दिव्य शक्ति है की जो एक बार उनके जागरों को सुन ले तो फिर वहीँ पर डेरा जमा लेता है, इन्हें विश्वकर्मा से लेकर घंटाकर्ण, कृष्ण भगवान से लेकर पांडवों की पंडवानी कंठस्त याद है, स्थानीय लोगों का कहना है की जब गेणु लाल जागरों में बादलों और हवाओं का आह्वान करतें है तो तेज बारिश और तेज हवाएँ चलने लगती है, जो की अपने आप में किसी दिव्य चमत्कार से कम नहीं है, उन्होंने एक नहीं बल्कि कई बार ऐसा साक्षत देखा है, भले ही आज के डिजिटल युग में शायद ही कोई ऐसा होगा जो इस प्रकार की बातों पर विश्वास कर सकेगा लेकिन वास्तव में ये हकीकत है, जागर विधा में इतनी महारथ हाशिल होने के बाद भी आज तक ज्यादा लोग इनके बारे में नहीं जान पायें है, इससे बड़ा दुःख का विषय और क्या हो सकता है की जिन लोगों ने बरसों से लोक की सांस्कृतिक विरासत को बचा के रखा है उन्ही लोगों से लोक आज भी अनजान है, ७० साल की उम्र में जहां लोग घर में ही कैद होकर रह जातें हैं वही गेणु लाल आज भी युवाओं की तरह जगह जगह अपने जागरों से लोगों को अभिभूत कर रहें हैं
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