Tuesday, 13 September 2016

1982 में ऐसा था उत्तराखंड का एक जिला मुख्यालय

क्रांति भट्ट गोपेश्वर। चमोली गढ़वाल जिला मुख्यालय ।

“” कभी इस तरह था मेरा गांव  गोपेश्वर “”

पढाल से ढके मकान . थोड़ी सी गरीबी . पर आत्मीयता की कमी नहीं .. दुख सुख में सब एक ।   एक घर का चूल्हा जला तो करछी में आग के कोयले लेकर दूसरा अपना चूल्हा जलाता . इस प्रकार कई घरों के चूल्हे जलते ।किसी के घर में दूध नहीं तो थोडा थोडा दूध गिलास में भरकर पडोसी उस घर में पहुंचाते . और इस घर में इतना दूध हो जाता कि न सिर्फ़  इर घर के बच्चे डटकर पीते वरन कभी क भी पर्या पर “” छां छुवली भी होती ।एक की बेटी की शादी होती तो पूरा गां जुट जाता था ।याद आता है अब भीसमाल झील से मालू के पत्ते तोडकर लाना और शादी के लिए पत्तल पूडे बनाना ।
हंसी मजाक .ठटठा लगाना . नाराज होना फिर मान भी जाना ।पुंगडों मे सवेरे ही बैल . हल लेकर जाना . एक दो ” स्यूं लगाना कि कभी हल की फाल  का निकल जाना . कभी हल ताडी तो कभी … . कभी नसूडू टूट जाना तो कभी पडवा बल्द के नखरे सहना . झुझला जाना . तभी मां का रोटी सब्जी लैकर पुंगडे मैं आना . साथ में कंडी मे बैलों के लिए एक पूली घास भी लाना . एक लोटे पानी में हाथ भी धोना चरचरी भुजी के साथ रोटी खाना और उतने ही पानी से प्यास बुझाना .. हां मा की लायी रोटियों मे एक रोटी को दोनो बैलों को खिलाना न भूलना सब याद है ।तीज त्योहार पर सबका जुडना और होली में रंममस्त होना ।भाभियों के साथ ठसाक मजाक .  कभी कभी कालेज गोल कर जीरो बैंड में लूकना भी याद है या नहाने के लिये धडाम दोपहर में बालखिला गदरा या वैतरणी जाना कैसे भूलें।छोटे थे तो  स्कूल के कपडे उतार कर बैतरणी में बग्वती काटना . अचानक पानी लेने भाभियों का वहाँ आना तो मारे शर्म  के कुंड गदरे से बाहर ही न आना ।घर आकर मां बबा जी उनकै द्वारा की गयी शिकायत पर कंडाली या भ्यंकुले की स्यटगी मे मार  खाना आज भी याद है ।कभी जाति का अहंकार या घृणा का न होना देखा और भोगा है ।गुलाबू बोडा की कडकती आवाज मे झाड खाना ।आलम दास दिदा की हडलात और उनसे हाथ जोडकर निवेदन करना कि बबा जी या माँ को न बताना सब आज भी याद है
हमारे गांव में सभी फसलैं कभी खूब होती थी ।वो ग्यूं की दैं करना . सटटी का मांडना . उडद के लगुले को रवीस के डंडो से कूटना कौन भूलेगा ।लम्बी कहानी है मेरे गांव की ।
पल अब ये नगर बन गया है सीमेंट के डिजाइन दार कुछ बडेसकुछ छोटे कुछ आलीशान ।बिजली . पंखे  फ्रीज . टीवी . स्मार्ट फोन . जाने कितनी गाडियां . बाइक . अब गांव के लोग ही नही हर ओर के लोगों ने अपना लिया है इस गोपेश्वर को ।पर मेरे छुटपन का गोपेश्वर जाने कहाँ हर्च गया खो गया ।गांव से नगर . नगर से नगर पालिका . बन  गया है ये बडा शहर . पर मै ढूंढता हूं अभी अभी वो छोटा सा गांव . जहां कभी “” वो ” सब कुछ ” था जो अब बडे होने पर जाने कहां खो गया ।

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